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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
तद्रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः |  ३१   क
सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह |  ३१   ख
तत्रर्षय़ः सप्त जाता जज्ञिरे मरुतां गणाः ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति