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विराट पर्व
अध्याय ६०
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वैशम्पाय़न उवाच
शरप्रतप्तः स तु नागराजः; प्रवेपिताङ्गो व्यथितान्तरात्मा |  १०   क
संसीदमानो निपपात मह्यां; वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति