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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
इदमन्यच्च राजेन्द्र शृण्वाश्चर्यतरं भुवि |  ३३   क
महर्षेश्चरितं यादृक्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति