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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव ह |  ३७   क
सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति