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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
भो भो व्राह्मण धर्मज्ञ किमर्थं नरिनर्त्सि वै |  ३८   क
हर्षस्थानं किमर्थं वै तवेदं मुनिसत्तम |  ३८   ख
तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति