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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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ऋषिरु उवाच
किं न पश्यसि मे व्रह्मन्कराच्छाकरसं स्रुतम् |  ३९   क
यं दृष्ट्वा वै प्रनृत्तोऽहं हर्षेण महता विभो ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति