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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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ऋषिरु उवाच
त्वय़ा सृष्टमिदं विश्वं वदन्तीह मनीषिणः |  ४४   क
त्वामेव सर्वं विशति पुनरेव युगक्षय़े ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति