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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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ऋषिरु उवाच
एवं स्तुत्वा महादेवं स ऋषिः प्रणतोऽव्रवीत् |  ४७   क
भगवंस्त्वत्प्रसादाद्वै तपो मे न क्षरेदिति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति