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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
महाकाय़मुपश्लिष्टं कुक्कुटं वलिनां वरम् |  २४   क
गृहीत्वा व्यनदद्भीमं चिक्रीड च महावलः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति