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शान्ति पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
मृत्युरात्मेच्छय़ा यस्य जातस्य मनुजेष्वपि |  १४   क
तथानपत्यस्य सतः पुण्यलोका दिवि श्रुताः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति