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शान्ति पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां चास्मदादीनां द्रौपद्याश्च परन्तप |  २५   क
कुरु प्रिय़ममित्रघ्न लोकस्य च हितं कुरु ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति