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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
एतदीदृशकं वृत्तं राजन्सुप्तजने विभो |  १४८   क
ततो जनक्षय़ं कृत्वा पाण्डवानां महात्ययम् |  १४८   ख
दिष्ट्या दिष्ट्येति चान्योन्यं समेत्योचुर्महारथाः ||  १४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति