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अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
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पञ्चचूडो उवाच
नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासां वय़सि संस्थितिः |  १७   क
विरूपं रूपवन्तं वा पुमानित्येव भुञ्जते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति