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शान्ति पर्व
अध्याय ३
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नारद उवाच
सोऽहं भृगोः सुदय़ितां भार्यामपहरं वलात् |  २०   क
महर्षेरभिशापेन कृमिभूतोऽपतं भुवि ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति