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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
मित्रसम्वन्धिनश्चापि सन्त्यक्ष्यन्ति नरास्तदा |  ८२   क
जनं परिजनं चापि युगान्ते पर्युपस्थिते ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति