आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ३८

कुन्त्यु उवाच

भगवञ्श्वशुरो मेऽसि दैवतस्यापि दैवतम् |  १   क
स मे देवातिदेवस्त्वं शृणु सत्यां गिरं मम ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति