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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
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कुन्त्यु उवाच
स मामुवाच वेपन्तीं वरं मत्तो वृणीष्व ह |  १०   क
गम्यतामिति तं चाहं प्रणम्य शिरसावदम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति