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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
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कुन्त्यु उवाच
यच्चास्य राज्ञो विदितं हृदिस्थं भवतोऽनघ |  १८   क
तं चाय़ं लभतां काममद्यैव मुनिसत्तम ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति