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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
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कुन्त्यु उवाच
शौचेन त्वागसस्त्यागैः शुद्धेन मनसा तथा |  ३   क
कोपस्थानेष्वपि महत्स्वकुप्यं न कदाचन ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति