सभा पर्व  अध्याय ३८

शिशुपाल उवाच

अन्तरात्मनि विनिहिते; रौषि पत्ररथ वितथम् |  ४०   क
अण्डभक्षणमशुचि ते; कर्म वाचमतिशय़ते ||  ४०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति