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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
आत्मनापञ्चमोऽय़ुध्यं पाञ्चालस्य वलेन ह |  ४७   क
तस्मिन्देशे व्यवस्थाप्य यत्र शारद्वतः स्थितः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति