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वन पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
नैव नः पार्थ भोगेषु न धने नोत जीविते |  २३   क
तुष्टिर्वुद्धिर्भवित्री वा त्वय़ि दीर्घप्रवासिनि ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति