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वन पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वय़ि नः पार्थ सर्वेषां सुखदुःखे समाहिते |  २४   क
जीवितं मरणं चैव राज्यमैश्वर्यमेव च |  २४   ख
आपृष्टो मेऽसि कौन्तेय़ स्वस्ति प्राप्नुहि पाण्डव ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति