वन पर्व  अध्याय ३८

वैशम्पाय़न उवाच

नेहास्ति धनुषा कार्यं न सङ्ग्रामेण कर्हिचित् |  ३४   क
निक्षिपैतद्धनुस्तात प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति