वन पर्व  अध्याय १४६

वैशम्पाय़न उवाच

तदपश्यत पाञ्चाली दिव्यगन्धं मनोरमम् |  ७   क
अनिलेनाहृतं भूमौ पतितं जलजं शुचि ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति