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वन पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
ईप्सितो ह्येष मे कामो वरं चैनं प्रय़च्छ मे |  ३८   क
त्वत्तोऽद्य भगवन्नस्त्रं कृत्स्नमिच्छामि वेदितुम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति