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वन पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
क्रिय़तां दर्शने यत्नो देवस्य परमेष्ठिनः |  ४४   क
दर्शनात्तस्य कौन्तेय़ संसिद्धः स्वर्गमेष्यसि ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति