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वन पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
अद्य चेय़ं मही कृत्स्ना दुर्योधनवशानुगा |  ८   क
त्वय़ि व्यपाश्रय़ोऽस्माकं त्वय़ि भारः समाहितः |  ८   ख
तत्र कृत्यं प्रपश्यामि प्राप्तकालमरिन्दम ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति