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वन पर्व
अध्याय २३
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वासुदेव उवाच
ततो विषण्णमनसो मम राजन्सुहृज्जनाः |  १५   क
रुरुदुश्चुक्रुशुश्चैव दुःखशोकसमन्विताः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति