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विराट पर्व
अध्याय ३८
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वृहन्नडो उवाच
व्यवहार्यश्च राजेन्द्र शुचिश्चैव भविष्यसि |  १२   क
धनूंष्येतानि मा भैस्त्वं शरीरं नात्र विद्यते ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति