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विराट पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तः स पार्थेन रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली |  १४   क
आरुरोह शमीवृक्षं वैराटिरवशस्तदा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति