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विराट पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
तमन्वशासच्छत्रुघ्नो रथे तिष्ठन्धनञ्जय़ः |  १५   क
परिवेष्टनमेतेषां क्षिप्रं चैव व्यपानुद ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति