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विराट पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा संनहनान्येषां परिमुच्य समन्ततः |  १६   क
अपश्यद्गाण्डिवं तत्र चतुर्भिरपरैः सह ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति