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विराट पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
समादिष्टो मय़ा क्षिप्रं धनूंष्यवहरोत्तर |  २   क
नेमानि हि त्वदीय़ानि सोढुं शक्ष्यन्ति मे वलम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति