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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त; मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव |  ४६   क
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन; सहस्रवाहो भव विश्वमूर्ते ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति