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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
तमार्जुनिवशं प्राप्तं कृष्यमाणमनाथवत् |  ५६   क
पौरवं पतितं दृष्ट्वा नामृष्यत जय़द्रथः ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति