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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
विदार्य नागांश्च रथांश्च वाजिनः; शरोत्तमैर्वासववज्रसंनिभैः |  ९   क
द्रुतं यय़ौ कर्णजिघांसय़ा तथा; यथा मरुत्वान्वलभेदने पुरा ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति