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द्रोण पर्व
अध्याय १२५
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सञ्जय़ उवाच
न द्रोणो न च राधेय़ो नाश्वत्थामा कृपो न च |  २   क
क्रुद्धस्य प्रमुखे स्थातुं पर्याप्ता इति मारिष ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति