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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
अप्रार्थितं प्रार्थय़से सुहृदो न हि सन्ति ते |  २३   क
ये त्वां न वारय़न्त्याशु प्रपतन्तं हुताशने ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति