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कर्ण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
ते वध्यमानाः समरे पार्थचापच्युतैः शरैः |  १७   क
तत्र तत्र स्म लीय़न्ते भय़े जाते महारथाः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति