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उद्योग पर्व
अध्याय ३८
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विदुर उवाच
न स रात्रौ सुखं शेते ससर्प इव वेश्मनि |  ३७   क
यः कोपय़ति निर्दोषं सदोषोऽभ्यन्तरं जनम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति