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द्रोण पर्व
अध्याय ३८
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सञ्जय़ उवाच
अहमेनं हनिष्यामि महाराज व्रवीमि ते |  २२   क
मिषतां पाण्डुपुत्राणां पाञ्चालानां च पश्यताम् |  २२   ख
ग्रसिष्याम्यद्य सौभद्रं यथा राहुर्दिवाकरम् ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति