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उद्योग पर्व
अध्याय ९५
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वैशम्पाय़न उवाच
ते च क्षय़ान्ते जगतो हित्वा लोकत्रय़ं सदा |  ५   क
क्षय़ं गच्छन्ति वै सर्वे सृज्यन्ते च पुनः पुनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति