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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
उषित्वा तत्र रामस्तु सम्पूज्याश्रमवासिनः |  १   क
तथा मङ्कणके प्रीतिं शुभां चक्रे हलाय़ुधः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति