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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
महोदरस्य तल्लग्नं जङ्घाय़ां वै यदृच्छय़ा |  ११   क
वने विचरतो राजन्नस्थि भित्त्वास्फुरत्तदा ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति