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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
आप्लुतः सर्वतीर्थेषु न च मोक्षमवाप्तवान् |  १५   क
स तु शुश्राव विप्रेन्द्रो मुनीनां वचनं महत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति