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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र दत्त्वा वहून्दाय़ान्विप्रान्सम्पूज्य माधवः |  २१   क
जगाम वृष्णिप्रवरो रुषङ्गोराश्रमं तदा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति