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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र तप्तं तपो घोरमार्ष्टिषेणेन भारत |  २२   क
व्राह्मण्यं लव्धवांस्तत्र विश्वामित्रो महामुनिः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति