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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र विधिना राजन्नाप्लुतः सुमहातपाः |  २८   क
ज्ञात्वा तीर्थगुणांश्चैव प्राहेदमृषिसत्तमः |  २८   ख
सुप्रीतः पुरुषव्याघ्र सर्वान्पुत्रानुपासतः ||  २८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति