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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्लुत्य स धर्मात्मा उपस्पृश्य हलाय़ुधः |  ३०   क
दत्त्वा चैव वहून्दाय़ान्विप्राणां विप्रवत्सलः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति