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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
ससर्ज यत्र भगवाँल्लोकाँल्लोकपितामहः |  ३१   क
यत्रार्ष्टिषेणः कौरव्य व्राह्मण्यं संशितव्रतः |  ३१   ख
तपसा महता राजन्प्राप्तवानृषिसत्तमः ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति